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दीवान ए सैफ़

मेरे हर शेर में एक कहानी है, हर कहानी मे बोहोत से क़िस्से हैं, उन किस्सों की बोहोत सी यादे हैं, उन यादो में बोह्तो के हिस्से हैं!

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Saturday, July 3, 2010

(6) यूँ नफ़रत से तो न देख !

मेरे महबूब मेरी हस्ती को यूँ नफ़रत से तो न देख,
हमने मोहब्बत भरे ख्वाबों को सजाया था कभी.


हम जुदा होंगे अलग ख्वाबों की दुनिया होगी,
ये तसव्वुर भी मेरे ज़हन में न आया था कभी.


हो सके ख़्वाब न पूरे मगर खुश तो है तू,
अपनी खुशियों का तो मैं ज़िक्र भी न लाया था कभी.


 तेरी तमन्नाएँ हों पूरी बड़ी तहज़ीब के साथ ,
अब न हो शायद मगर उनमे मेरा साया था कभी !
Posted by Dr. Saif Zahid at 2:04 PM Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

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