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दीवान ए सैफ़

मेरे हर शेर में एक कहानी है, हर कहानी मे बोहोत से क़िस्से हैं, उन किस्सों की बोहोत सी यादे हैं, उन यादो में बोह्तो के हिस्से हैं!

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Saturday, July 17, 2010

10) मेरा बचपन

आँखों में बचपन मेरा ऐसे है,
जैसे  बस कल गुज़रा!

कंधे पे बस्ता , हाथो में डंडी ,
स्कूल का वो रस्ता कबका चल गुज़रा !

बहनों से लड़ना , मम्मी से पिटना,
रोने से पहले मैं बहल गुज़रा,

लम्बे वो छै  दिन और  सन्डे की दस्तक,
 वो जो आना था वो भी 'कल' गुज़रा,

लड़कपन की शोखी का चंचल सा लम्हा,
हाथो से मेरे कब फिसल गुज़रा.

मोहब्बत के क़िस्से,उदासी भरे दिन,
मुश्किल था जीना पर सहल गुज़रा.
Posted by Dr. Saif Zahid at 4:10 PM Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

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