जो भी था वो तेरे नाम का था ,
तू ना था तो मैं भी नाम का था !
हो चुका था गुम तन्हा अंधेरो में,
हाँ वो वक़्त मेरे अंजाम का था !
न कर सका फ़क़त एक उम्मीद पैदा,
सैफ़ आख़िर तू किस काम का था !
तू ना था तो मैं भी नाम का था !
हो चुका था गुम तन्हा अंधेरो में,
हाँ वो वक़्त मेरे अंजाम का था !
न कर सका फ़क़त एक उम्मीद पैदा,
सैफ़ आख़िर तू किस काम का था !

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