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दीवान ए सैफ़

मेरे हर शेर में एक कहानी है, हर कहानी मे बोहोत से क़िस्से हैं, उन किस्सों की बोहोत सी यादे हैं, उन यादो में बोह्तो के हिस्से हैं!

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Saturday, July 3, 2010

(7) किस काम का था !

जो भी था वो तेरे नाम का था ,
तू ना था तो मैं भी नाम का था !


हो चुका था गुम  तन्हा अंधेरो में,
हाँ वो वक़्त मेरे अंजाम का था !


न कर सका फ़क़त एक उम्मीद पैदा,
सैफ़ आख़िर तू किस काम का था !
Posted by Dr. Saif Zahid at 2:19 PM Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

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