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दीवान ए सैफ़

मेरे हर शेर में एक कहानी है, हर कहानी मे बोहोत से क़िस्से हैं, उन किस्सों की बोहोत सी यादे हैं, उन यादो में बोह्तो के हिस्से हैं!

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Saturday, July 17, 2010

10) मेरा बचपन

आँखों में बचपन मेरा ऐसे है,
जैसे  बस कल गुज़रा!

कंधे पे बस्ता , हाथो में डंडी ,
स्कूल का वो रस्ता कबका चल गुज़रा !

बहनों से लड़ना , मम्मी से पिटना,
रोने से पहले मैं बहल गुज़रा,

लम्बे वो छै  दिन और  सन्डे की दस्तक,
 वो जो आना था वो भी 'कल' गुज़रा,

लड़कपन की शोखी का चंचल सा लम्हा,
हाथो से मेरे कब फिसल गुज़रा.

मोहब्बत के क़िस्से,उदासी भरे दिन,
मुश्किल था जीना पर सहल गुज़रा.
Posted by Dr. Saif Zahid at 4:10 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

Saturday, July 3, 2010

9) आखरी ख़त !

भूले नहीं जाते हैं मुझसे दिन वो पुराने,
जन्नत से थे रौशन वो ख्वाबो से सुहाने !
         हैं जज़्ब वो दिन अज भी किसी हिस्से में मेरे दिल के,
         वो मौसम चार, जो हमने, गुज़ारे थे कभी मिल के !
अब वो मौसम न कभी लौट के फिर आयेंगे,
वक़्त गुजरेगा कभी हम नही गुज़र जायेंगे !
        एक गुज़ारिश है हमे भूल भले ही जाना,
        पर उन लम्हों को सदा दिल से लगा कर रखना,
थीं वो नेमत जिनको ता-उम्र जानें तरसीं हैं,
बोहोत कम वक़्त, पर है शुक्र, हमपे बरसी हैं ,
        मुझको हर वो क़िस्सा हर मुलाक़ात याद है अब भी,
        हर दिन वो मिलना, रातों को करना बात याद है अब भी,
अब भी तेरी खुशबु मेरी साँसों से आती है मुझको,
अब भी तेरे होंटों की नरमी छू के जाती है मुझको,
        आज  भी वो रुमाल का क़िस्सा याद कर के हँसता हूँ मैं,
        जहाँ हम मिलते थे, कुछ देर वहां जा के बस्ता हूँ मैं ,
पता है तुमको अब भी हमारे नाम के निशां उस पेड़ पे हैं,
फर्क इतना है के अब उनके साथ और भी कई नाम ढेर से हैं !
       अक्सर बहते पानी पे जा के अक्स देखा करता हूँ,
       अब भी उस दरया से मैं जा के मिला करता हूँ,
जिसके किनारे पे हम कई वादे किया करते थे,
याद रखेंगे ये दिन, ये इरादे किया करते थे,
       अब न वो पीपे का पुल है न हवा के झोंके,
       न ही वो पगडण्डी, निकलते थे जिनपे हम होके,
दिल करता है अपने हाथों से खिलाऊ तुमको,
फिर तुम्हे छेड़ूँ , रुलाऊं, मनाऊं तुम को,
       अच्छा हुआ के तुम भूल गए हो सब कुछ,
       तड़पते तुम भी, जो याद आ जाता बस कुछ,
ये मेरा आखरी ख़त है, के जा रहा हूँ मैं,
तेरी दुनिया से दूर दुनिया बसा रहा हूँ मैं,
       बोहोत मुश्किल है अब और तेरे शहर में जीना,
       जहाँ तेरी याद न हो ऐसी कोई जगह बची न,
इतने आंसू अब मैं और नहीं बहा सकता,
लम्बी रातों को मुझसे और नहीं जगा जा सकता,
       बस दुआ मेरी है तुझे खुशियाँ और क़रार  मिले,
       जिस क़दर चाहा है मैंने तुमको उतना प्यार मिले,

This khat in my voice..
Posted by Dr. Saif Zahid at 3:16 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

8) दिल की आवाज़ !

कितने नज़दीक से आती है तेरे दिल की आवाज़,
मेरा सर तेरे सीने पे है? या तेरा दिल मेरे पास है?
Posted by Dr. Saif Zahid at 2:22 PM 1 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

(7) किस काम का था !

जो भी था वो तेरे नाम का था ,
तू ना था तो मैं भी नाम का था !


हो चुका था गुम  तन्हा अंधेरो में,
हाँ वो वक़्त मेरे अंजाम का था !


न कर सका फ़क़त एक उम्मीद पैदा,
सैफ़ आख़िर तू किस काम का था !
Posted by Dr. Saif Zahid at 2:19 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

(6) यूँ नफ़रत से तो न देख !

मेरे महबूब मेरी हस्ती को यूँ नफ़रत से तो न देख,
हमने मोहब्बत भरे ख्वाबों को सजाया था कभी.


हम जुदा होंगे अलग ख्वाबों की दुनिया होगी,
ये तसव्वुर भी मेरे ज़हन में न आया था कभी.


हो सके ख़्वाब न पूरे मगर खुश तो है तू,
अपनी खुशियों का तो मैं ज़िक्र भी न लाया था कभी.


 तेरी तमन्नाएँ हों पूरी बड़ी तहज़ीब के साथ ,
अब न हो शायद मगर उनमे मेरा साया था कभी !
Posted by Dr. Saif Zahid at 2:04 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

(5) ख़्वाब में आना तेरा !

सुबह हुई फिर तुम्हारा ख्याल आने लगा !
रात भर काफी नहीं था ख़्वाब में आना तेरा ?


ज़िद ये कैसी है तेरी, मुझको  दिखाने  के लिए,
देखा नहीं जाता है, यूँ ख़ुद को मिटाना तेरा,
Posted by Dr. Saif Zahid at 1:38 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

4) दिल पत्थर

दिल पे पत्थर रख के कोई काम जो किया,
इलज़ाम ये मिला के दिल पत्थर का हो गया.


पथरीली रहगुज़र थी , पत्थर के लोग थे,
पत्थरों के बीच रह के मैं पत्थर का हो गया.
Posted by Dr. Saif Zahid at 1:17 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

(3) गर मुझको प्यार है !

सौ मुश्किलें, सौ रंजिशे, गर मुझको प्यार है.
हर एक को शिकायत है, गर मुझको प्यार है.

ये क्या है , ऐसा क्यूँ है, कहाँ की भलाई है ,
क्यूँ ज़िन्दगी आसां नहीं गर मुझको प्यार है.
Posted by Dr. Saif Zahid at 1:13 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

(2) वक़्त गुज़र ही जाएगा

किस किस की यादों को कब तक अपने दिल में रखेंगे,
कब तक टूटा दिल ये मेरा इतना बोझ उठाएगा.


हर एक दिन का हर एक लम्हा उनकी याद में जीता हूँ,
हर लम्हा है साथ जो, उनका वक़्त गुज़र ही जाएगा.
Posted by Dr. Saif Zahid at 1:05 PM 0 comments Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest
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