सोचना वो सब मेरा ज़ाया गया ,
जो पड़ा मुझ पर वो निभाया गया,
मोड़ था वो शजृ ओ गुल ओ रंग बर,
मुझेसे भी आगे और न जाया गया,
रोकते ही रह गए हम हाथ को,
माल था फ़ानी के बस आया गया,
ज़िन्दगी में और भी थे मरहले,
रंग उल्फ़त का न चढ़ाया गया.
जो पड़ा मुझ पर वो निभाया गया,
मोड़ था वो शजृ ओ गुल ओ रंग बर,
मुझेसे भी आगे और न जाया गया,
रोकते ही रह गए हम हाथ को,
माल था फ़ानी के बस आया गया,
ज़िन्दगी में और भी थे मरहले,
रंग उल्फ़त का न चढ़ाया गया.

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