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दीवान ए सैफ़

मेरे हर शेर में एक कहानी है, हर कहानी मे बोहोत से क़िस्से हैं, उन किस्सों की बोहोत सी यादे हैं, उन यादो में बोह्तो के हिस्से हैं!

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Sunday, June 20, 2010

(1) दर्द संभाला नहीं गया !

कुछ यूँ हुआ के मुझसे ख़फा हो गए हबीब ,
कुछ यूँ हुआ के मुझसे मनाया नहीं गया !


कुछ यूँ हुआ के आँख से आंसू निकल पड़े ,
कुछ यूँ हुआ के दर्द संभाला नहीं गया !


कुछ यूँ हुआ के ज़ख्म भी रिसता रहा मगर,
कुछ यूँ हुआ के तेरा नाम मिटाया नहीं गया !


कुछ यूँ हुआ के तुझ को भुलाने का ग़म हुआ,
कुछ यूँ हुआ के इस ग़म को भुलाया नहीं गया !


कुछ यूँ हुआ के मर मिटे जीने की आस में,
कुछ यूँ हुआ के मौत को मारा नहीं गया !


कुछ यूँ हुआ के भूलना चाहा बोहोत उन्हें ,
कुछ यूँ हुआ के "सैफ़" उनको भुलाया नहीं गया ! 
Posted by Dr. Saif Zahid at 8:50 PM Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest
Labels: कुछ यूँ हुआ, हिंदी

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