कुछ यूँ हुआ के मुझसे ख़फा हो गए हबीब ,
कुछ यूँ हुआ के मुझसे मनाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के आँख से आंसू निकल पड़े ,
कुछ यूँ हुआ के दर्द संभाला नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के ज़ख्म भी रिसता रहा मगर,
कुछ यूँ हुआ के तेरा नाम मिटाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के तुझ को भुलाने का ग़म हुआ,
कुछ यूँ हुआ के इस ग़म को भुलाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के मर मिटे जीने की आस में,
कुछ यूँ हुआ के मौत को मारा नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के भूलना चाहा बोहोत उन्हें ,
कुछ यूँ हुआ के "सैफ़" उनको भुलाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के मुझसे मनाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के आँख से आंसू निकल पड़े ,
कुछ यूँ हुआ के दर्द संभाला नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के ज़ख्म भी रिसता रहा मगर,
कुछ यूँ हुआ के तेरा नाम मिटाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के तुझ को भुलाने का ग़म हुआ,
कुछ यूँ हुआ के इस ग़म को भुलाया नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के मर मिटे जीने की आस में,
कुछ यूँ हुआ के मौत को मारा नहीं गया !
कुछ यूँ हुआ के भूलना चाहा बोहोत उन्हें ,
कुछ यूँ हुआ के "सैफ़" उनको भुलाया नहीं गया !

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